घर बैठे करिए मुंगेली की अधिष्ठात्री “माँ महामाया दाई” के दर्शन
मुंगेली / आज चैत्र नवरात्रि की पावन अष्टमी तिथि है। मुंगेली नगर के अधिष्ठात्री देवी, माँ महामाया देवी मंदिर (सोनार पारा) में आज सुबह से ही भक्ति और श्रद्धा का अद्भुत संगम देखने को मिल रहा है। सुबह की पहली किरण के साथ ही मंदिर के कपाट खुलते ही भक्तों की लंबी कतारें लगनी शुरू हो गई है कतारबद्ध होकर श्रद्धालु अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं।
आज ‘महाअष्टमी’ के विशेष अवसर पर मंदिर परिसर पूरी तरह से माता के जयकारों से गुंजायमान है। सुबह तड़के माता का विशेष अभिषेक और श्रृंगार किया गया। माँ महामाया को आज स्वर्ण आभूषणों और लाल चुनरी से अत्यंत भव्य रूप में सजाया गया है।

मंदिर के चारों ओर फल, फूल और नारियल की दुकानों पर भारी रौनक है। हवा में धूप-दीप की खुशबू और घंटों की गूंज ने पूरे मुंगेली को भक्तिमय कर दिया है।
जैसे-जैसे दिन चढ़ रहा है, मंदिर में अनुष्ठानों की गति बढ़ती जा रही है। पंडितों द्वारा विशेष मंत्रोच्चार के साथ हवन कुंड की वेदी तैयार की जा रही है। दोपहर को होने वाले महाहवन में शामिल होने के लिए दूर-दराज के गांवों से भी लोग पहुँच रहे हैं।
इतिहास और महत्ता: सदियों पुरानी है माँ की महिमा
मुंगेली के सोनार पारा स्थित महामाया मंदिर का इतिहास अत्यंत प्राचीन और गौरवशाली है। जनश्रुतियों और क्षेत्रीय इतिहास के अनुसार, इस मंदिर का संबंध कलचुरी कालीन राजाओं से जोड़ा जाता है।
स्थापना: माना जाता है कि मुंगेली का यह मंदिर रतनपुर की देवी का ही एक स्वरूप है। प्राचीन समय में जब मुंगेली एक छोटा सा पड़ाव हुआ करता था, तब भक्तों की श्रद्धा ने यहाँ माँ की प्रतिमा स्थापित की।
स्थापत्य: मंदिर की बनावट में पारंपरिक छत्तीसगढ़ी स्थापत्य कला की झलक मिलती है। समय के साथ मंदिर का जीर्णोद्धार किया गया, लेकिन गर्भ गृह में स्थापित माता की प्रतिमा की सौम्यता और शक्ति आज भी वैसी ही है जैसी सदियों पहले थी।
मान्यता: स्थानीय निवासियों का अटूट विश्वास है कि मुंगेली शहर पर आने वाली हर विपत्ति को ‘महामाया दाई’ अपने ऊपर ले लेती हैं। सोनार पारा का यह मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि मुंगेली की सांस्कृतिक पहचान का केंद्र है। यहाँ जलने वाली ‘अखंड ज्योति कलश’ की महिमा ऐसी है कि लोग विदेशों से भी यहाँ अपनी मनोकामना जोत प्रज्वलित करवाते हैं।

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