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मुंगेली / आधुनिक हिंदू समाज में धर्म और व्यक्तिगत आचरण के बीच एक ऐसा गहरा और ज्वलंत विरोधाभास उभर कर सामने आया है, जो हमारी आध्यात्मिक ईमानदारी पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। एक ओर जहाँ शारदीय और चैत्र नवरात्रि के पावन नौ दिनों में समूचा वातावरण ‘अहिंसा परमो धर्म’ और ‘सात्विकता’ के संकल्प से ओतप्रोत हो जाता है, वहीं दूसरी ओर दशमी की सुबह होते ही समाज का एक बड़ा वर्ग अपनी उसी ‘श्रद्धा’ को तिलांजलि देकर मांस, मदिरा और तामसिक भोजन के अनियंत्रित उपभोग में डूब जाता है।


यह विडंबना नहीं तो और क्या है कि जिन नौ दिनों में हम ‘कन्या पूजन’ कर नारी शक्ति और जीव मात्र में देवी का अंश देखते हैं, उन्हीं नौ दिनों के बीतते ही हमारी संवेदनाएं इतनी सुप्त हो जाती हैं कि हम स्वाद के लिए मूक प्राणियों की बलि और उनके मांस भक्षण को सहज स्वीकार कर लेते हैं? वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से ‘व्रत’ का अर्थ केवल भूखा रहना नहीं, बल्कि इंद्रियों पर विजय प्राप्त करना और शरीर को शुद्ध करना होता है; किंतु आज के समय में यह व्रत केवल एक ‘कैलेंडर आधारित औपचारिकता’ बनकर रह गया है। यदि नौ दिनों तक मांस का त्याग जीव दया और आत्म-शुद्धि के लिए था, तो क्या दसवें दिन वह जीव दया अप्रासंगिक हो जाती है? क्या हमारी देवी और हमारे संस्कार केवल नौ दिनों के लिए ही ‘सक्रिय’ होते हैं? यह प्रवृत्ति दर्शाती है कि समाज में धर्म अब नैतिक मूल्यों के स्थायी पालन के बजाय एक ‘सुविधाजनक अनुष्ठान’ बन चुका है, जहाँ हम अपनी इच्छाओं को नौ दिन के लिए ‘पॉज़’ (Pause) तो करते हैं, लेकिन उन्हें खत्म करने का प्रयास नहीं करते। वेदों और उपनिषदों का मूल सार ‘अहिंसा’ और ‘निरंतर संयम’ है, न कि किसी विशेष अवधि का दिखावा। जब हम व्रत के तुरंत बाद ‘भरपेट’ मांस और तामसिक आहार का सेवन करते हैं, तो हम न केवल अपने पाचन तंत्र पर प्रहार करते हैं, बल्कि उस आध्यात्मिक ऊर्जा को भी नष्ट कर देते हैं जिसे हमने नौ दिनों की कठिन साधना से अर्जित किया था। यह मुद्दा केवल खान-पान का नहीं है, बल्कि हमारी वैचारिक अखंडता का है। यदि हम नौ दिन तक सात्विक रहकर अपनी मानसिक और शारीरिक स्थिति में सुधार महसूस करते हैं, तो क्यों हम पुनः उसी तामसिक दलदल में गिरना चाहते हैं? समाज को आज इस ज्वलंत मुद्दे पर आत्मचिंतन करने की आवश्यकता है कि क्या हमारी आस्था केवल डर और दिखावे पर आधारित है, या हम वास्तव में धर्म के मूल तत्व ‘दया’ और ‘संयम’ को अपने जीवन का स्थायी हिस्सा बनाना चाहते हैं। जब तक धर्म हमारे आचरण में निरंतरता नहीं लाएगा, तब तक ऐसे अनुष्ठान केवल बाहरी आडंबर ही कहलाएंगे। यह समय है कि हम ‘सुविधा की भक्ति’ को त्याग कर ‘मूल्यों की शक्ति’ को पहचानें और यह समझें कि ईश्वर किसी विशेष तिथि का मोहताज नहीं, बल्कि वह हर क्षण हमारे आचरण और हमारी संवेदनाओं में वास करता है।

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