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मुंगेली / जिले में इन दिनों गौ-वंश के संरक्षण को लेकर सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच एक बड़ा फासला नजर आ रहा है, जहाँ एक ओर प्रशासन ‘गौ-धाम’ और ‘गौठान’ जैसी योजनाओं के जरिए पशुओं के सुनहरे भविष्य का खाका खींच रहा है, वहीं दूसरी ओर मुंगेली की व्यस्त सड़कें हर रात बेजुबान गायों के खून से लाल हो रही हैं।

इस विडंबना की सबसे कड़वी सच्चाई यह है कि ये पशु लावारिस नहीं हैं, बल्कि उन स्वार्थी पशुपालकों की भेंट चढ़ रहे हैं जो सुबह अपनी गायों का दूध तो पूरी श्रद्धा के साथ निकाल लेते हैं, लेकिन शाम होते ही उन्हें चारे और देख-रेख के खर्च से बचने के लिए बेरहमी से सड़कों पर मरने के लिए धकेल देते हैं। पशुपालकों की यह ‘दूध निकालो और छोड़ो’ की मानसिकता न केवल गौ-वंश के लिए प्राणघातक साबित हो रही है, बल्कि रात के अंधेरे में सड़कों पर बैठे ये मवेशी वाहन चालकों के लिए भी काल बन रहे हैं, जिससे आए दिन होने वाले हादसों में बेकसूर लोग अपनी जान गंवा रहे हैं।

‘गौ-धाम’ जैसी महत्वाकांक्षी योजनाएं धरातल पर इसलिए दम तोड़ रही हैं क्योंकि इनमें संसाधनों की भारी कमी है और प्रशासन का डर उन गाय मालिकों में बिल्कुल नहीं है जो सड़कों को अपना निजी चारागाह समझ बैठे हैं। मुंगेली की जागरूक जनता अब यह तीखा सवाल पूछ रही है कि क्या गौ-सेवा केवल नारों और कागजी आंकड़ों तक सीमित रहेगी या फिर प्रशासन उन पशु मालिकों को चिन्हित कर उनके खिलाफ कठोर कानूनी कार्यवाही और एफआईआर दर्ज करने की हिम्मत जुटा पाएगा? यदि जल्द ही इन लापरवाह मालिकों पर भारी जुर्माना नहीं लगाया गया और सड़कों से आवारा मवेशियों को हटाकर उन्हें वास्तव में सुरक्षित आश्रय नहीं दिया गया, तो सरकारी योजनाओं की यह विफलता मुंगेली की सड़कों पर बढ़ती मौतों की जिम्मेदार होगी, क्योंकि आस्था की प्रतीक गौ-माता को सड़कों पर तड़पने के लिए छोड़ देना किसी अपराध से कम नहीं है और इसके लिए प्रशासन की चुप्पी भी उतनी ही जिम्मेदार है जितने वे संवेदनहीन मालिक।

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