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हनुमान जी के अवतरण दिवस को लेकर समाज में ‘हनुमान जयंती’ और ‘हनुमान जन्मोत्सव’ शब्दों का प्रयोग बहुतायत में किया जाता है, परंतु इनके पीछे छिपे गहरे आध्यात्मिक और तार्किक पक्ष को समझना हर भक्त के लिए आवश्यक है। भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म में शब्दों का चयन केवल भाषा का विषय नहीं है, बल्कि यह हमारे आराध्य के प्रति हमारी दृष्टि और श्रद्धा को भी परिभाषित करता है। शास्त्रों के गहन अध्ययन और विद्वानों के मत के अनुसार, बजरंगबली के लिए ‘हनुमान जन्मोत्सव’ शब्द का प्रयोग करना न केवल अधिक सटीक है, बल्कि यह उनकी महिमा के प्रति अधिक सम्मानजनक भी है।
इसके पीछे का सबसे मुख्य कारण हनुमान जी का ‘चिरंजीवी’ होना है। हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार, हनुमान जी उन सात भाग्यशाली महापुरुषों में से एक हैं जिन्हें अमरता का वरदान प्राप्त है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने हनुमान चालीसा में स्पष्ट लिखा है— “अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता, अस बर दीन जानकी माता।” माता सीता ने उन्हें अजर-अमर होने का आशीर्वाद दिया था। व्याकरण और परंपरा की दृष्टि से देखा जाए तो ‘जयंती’ शब्द का प्रयोग उन महान पुरुषों या विभूतियों के लिए किया जाता है जो अब सशरीर हमारे बीच उपस्थित नहीं हैं और जिनका देहावसान हो चुका है। जब हम किसी की जयंती मनाते हैं, तो हम उनकी स्मृतियों को नमन करते हैं। इसके विपरीत, ‘जन्मोत्सव’ शब्द का अर्थ है—उनके जन्म का आनंदपूर्ण उत्सव मनाना, जो वर्तमान में भी हमारे साथ हैं।
हनुमान जी कलयुग के जागृत देवता माने जाते हैं। ऐसी मान्यता है कि जहाँ कहीं भी श्रद्धापूर्वक रामकथा का गान होता है, वहाँ हनुमान जी सूक्ष्म रूप में उपस्थित रहते हैं। जब भगवान स्वयं आज भी हमारे बीच मौजूद हैं, तो उनकी ‘जयंती’ मनाना तार्किक रूप से उचित नहीं लगता। उनके प्रकट होने के दिन को उत्सव की तरह मनाना, यह दर्शाता है कि हम उनकी जीवंत उपस्थिति को स्वीकार कर रहे हैं। यही कारण है कि काशी, अयोध्या और अन्य प्रमुख धार्मिक केंद्रों के विद्वान अब निरंतर इस बात पर जोर दे रहे हैं कि भक्तों को अपनी शब्दावली में सुधार करते हुए ‘हनुमान जन्मोत्सव’ शब्द को अपनाना चाहिए।
इस भाषाई शुद्धता का प्रभाव हमारी भक्ति की सघनता पर भी पड़ता है। जब हम ‘जन्मोत्सव’ कहते हैं, तो मन में यह भाव आता है कि हमारे स्वामी, हमारे रक्षक आज भी हमारे साथ हैं और हमारे दुखों का निवारण कर रहे हैं। यह शब्द हमें हनुमान जी के उस ‘संकटमोचन’ स्वरूप से जोड़ता है जो सदैव सक्रिय और चैतन्य है। समाज में इस जागरूकता के फैलने से नई पीढ़ी को भी धर्म के वैज्ञानिक और आध्यात्मिक आधारों की सही जानकारी मिलती है।
अंततः, भगवान भाव के भूखे होते हैं और वे अपने भक्त की पुकार किसी भी नाम से सुन लेते हैं। परंतु, एक जागरूक भक्त होने के नाते, यदि हम अपने शब्दों को शास्त्रों की मर्यादा और सत्य की कसौटी पर कसते हैं, तो हमारी भक्ति और भी अधिक तेजस्वी हो जाती है। अतः, चैत्र पूर्णिमा के पावन अवसर पर जब हम केसरीनंदन का जन्मदिन मनाएँ, तो गर्व और श्रद्धा के साथ इसे ‘हनुमान जन्मोत्सव’ कहें, ताकि विश्व को यह संदेश जाए कि पवनपुत्र आज भी अमर हैं और अपने भक्तों की रक्षा के लिए तत्पर हैं।

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