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रायपुर। बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर की जयंती के अवसर पर छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में भारी उत्साह देखने को मिला। भीम नगर के युवाओं ने एक अनूठी पहल करते हुए ‘अंबेडकर चौक’ पर एक ऐतिहासिक और भव्य पोस्टर का विमोचन किया। इस कार्यक्रम ने न केवल स्थानीय लोगों का ध्यान खींचा, बल्कि सोशल मीडिया पर भी इसकी काफी चर्चा हो रही है।
देर रात तक चले इस कार्यक्रम में युवाओं ने “जय भीम” के नारों और भीम गीतों पर थिरकते हुए पूरे माहौल को ऊर्जा से भर दिया। इस अवसर पर “संविधान रक्षक युवा समिति, भीम नगर रायपुर” का गठन भी किया गया, जिसका मुख्य उद्देश्य बाबा साहेब के विचारों को जन-जन तक पहुँचाना और समाज में संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करना है।
डॉ. बी.आर. अंबेडकर: एक युगपुरुष का जीवन परिचय
डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर, जिन्हें प्यार से ‘बाबा साहेब’ कहा जाता है, न केवल भारतीय संविधान के मुख्य शिल्पकार थे, बल्कि वे एक महान अर्थशास्त्री, समाज सुधारक और न्यायविद् भी थे। उनका जीवन संघर्ष, अटूट संकल्प और ज्ञान की अविरल धारा का प्रतीक है।
प्रारंभिक जीवन और संघर्ष
डॉ. अंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 को मध्य प्रदेश के महू (सैन्य छावनी) में हुआ था। वे अपने माता-पिता की 14वीं संतान थे। एक ‘महार’ परिवार में जन्म लेने के कारण, उन्हें बचपन से ही छुआछूत और जातिगत भेदभाव का कड़ा सामना करना पड़ा। स्कूल में उन्हें कक्षा के बाहर बैठना पड़ता था और उन्हें सार्वजनिक नल से पानी पीने तक की अनुमति नहीं थी। इन अपमानों ने उनके भीतर समाज को बदलने की लौ जलाई।
अदम्य शिक्षा यात्रा
तमाम सामाजिक बाधाओं के बावजूद, भीमराव ने अपनी शिक्षा जारी रखी। वे बॉम्बे के प्रसिद्ध एलफिंस्टन हाई स्कूल में दाखिला लेने वाले पहले दलित छात्र बने। इसके बाद बड़ौदा के महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ की छात्रवृत्ति की मदद से वे उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका और इंग्लैंड गए।
उन्होंने कोलंबिया विश्वविद्यालय (न्यूयॉर्क) से अर्थशास्त्र में एम.ए. और पीएचडी की।
लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से उन्होंने ‘डॉक्टर ऑफ साइंस’ (D.Sc) की उपाधि प्राप्त की।
वह अपने समय के सबसे शिक्षित भारतीयों में से एक थे, जिनके पास कई विषयों की गहरी समझ थी।
सामाजिक सुधार और आंदोलन
भारत लौटने के बाद, बाबा साहेब ने छुआछूत के खिलाफ निर्णायक जंग छेड़ दी। उनका मानना था कि जब तक समाज का एक बड़ा हिस्सा पिछड़ा रहेगा, देश सही मायनों में आजाद नहीं हो सकता।
मूकनायक और बहिष्कृत भारत: उन्होंने दलितों की आवाज उठाने के लिए समाचार पत्र शुरू किए।
महाड़ सत्याग्रह (1927): उन्होंने अछूतों को सार्वजनिक तालाब से पानी पीने का हक दिलाने के लिए यह ऐतिहासिक आंदोलन किया।
कालाराम मंदिर आंदोलन: नासिक के इस मंदिर में दलितों के प्रवेश के लिए उन्होंने लंबा संघर्ष किया।
भारतीय संविधान का निर्माण
स्वतंत्रता के बाद, डॉ. अंबेडकर को स्वतंत्र भारत का पहला कानून मंत्री बनाया गया। सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी उन्हें ‘संविधान मसौदा समिति’ के अध्यक्ष के रूप में मिली। उन्होंने दुनिया भर के संविधानों का अध्ययन किया और भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप एक ऐसा दस्तावेज तैयार किया जो:
जाति, धर्म, लिंग और रंग के आधार पर भेदभाव को समाप्त करता है।
कमजोर वर्गों और महिलाओं को समान अधिकार प्रदान करता है।
लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत करता है।
धर्म की ओर प्रस्थान
जीवन के अंतिम पड़ाव पर, उन्होंने महसूस किया कि हिंदू धर्म के भीतर रहते हुए जातिगत कुरीतियों को पूरी तरह मिटाना कठिन है। सामाजिक समानता और शांति की तलाश में उन्होंने 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर के दीक्षाभूमि में अपने लाखों अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म अपना लिया।
विरासत और प्रासंगिकता
6 दिसंबर 1956 को उनका महापरिनिर्वाण हुआ। मरणोपरांत 1990 में उन्हें भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया।
आज भी बाबा साहेब का नारा “शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो” करोड़ों युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है। रायपुर के युवाओं द्वारा किया गया यह आयोजन यह दर्शाता है कि बाबा साहेब के विचार आज की पीढ़ी के खून में दौड़ रहे हैं और वे एक समतामूलक समाज के निर्माण के लिए प्रतिबद्ध हैं।
“संविधान केवल वकीलों का दस्तावेज नहीं है, यह जीवन का एक माध्यम है।” – डॉ. बी.आर. अंबेडकर

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