
भारत देश एक अत्यंत दुर्लभ, पवित्र और ऐतिहासिक धार्मिक महासंयोग का साक्षी बन रहा है, जहाँ अखंड सौभाग्य की कामना का पावन पर्व ‘हरतालिका तीज’ और विघ्नहर्ता, बुद्धि के दाता भगवान श्री गणेश के जन्मोत्सव का पावन त्योहार ‘गणेश चतुर्थी’ एक ही दिन पूरी श्रद्धा, भक्ति और अद्वितीय हर्षोल्लास के साथ मनाए जा रहे हैं। सनातन धर्म की परंपराओं और ज्योतिषीय गणना के अनुसार, ग्रहों और नक्षत्रों के एक विशेष और अद्भुत फेरबदल के कारण कई दशकों के लंबे अंतराल के बाद यह दिव्य योग बना है, जिसने शिव परिवार के प्रति समर्पित भक्तों के दिलों में एक अभूतपूर्व उत्साह भर दिया है; जहाँ एक ओर देश की करोड़ों सुहागिन महिलाओं और कुंवारी कन्याओं ने मनचाहे व अखंड सौभाग्य की प्राप्ति के लिए कठोर निर्जला ‘हरतालिका तीज’ का व्रत रखकर सुबह के अत्यंत पवित्र ब्रह्म मुहूर्त (04:32 AM से 05:19 AM) और मुख्य प्रातः काल मुहूर्त (06:05 AM से 07:06 AM) में माता पार्वती और देवाधिदेव महादेव की बालू व मिट्टी से निर्मित दिव्य मूर्तियों का विधि-विधान से षोडशोपचार पूजन किया, वहीं दूसरी ओर जैसे ही सुबह 07:06 बजे तृतीया तिथि समाप्त हुई और चतुर्थी तिथि का प्रारंभ हुआ, वैसे ही पूरा वातावरण ‘गणपति बाप्पा मोरया, मंगल मूर्ति मोरया’ के गगनभेदी जयकारों, शंखध्वनि, ढोल-नगाड़ों और पारंपरिक भजनों से गुंजायमान हो उठा। इस महासंयोग की सबसे खूबसूरत बात यह है कि आज माता और पुत्र की आराधना एक ही दिन हो रही है, जिससे इस दिन का आध्यात्मिक महत्व हजार गुना बढ़ गया है, और इसी पावन कड़ी में भगवान गणेश जी की प्रतिमा को घरों, मंदिरों और भव्य पंडालों में स्थापित करने के लिए दोपहर 11:02 बजे से दोपहर 01:31 बजे तक का सबसे श्रेष्ठ और कल्याणकारी मुहूर्त निर्धारित किया गया था, जिसके तहत देश के कोने-कोने में भक्तों ने पूरी भव्यता के साथ इको-फ्रेंडली मिट्टी के बाप्पा का स्वागत कर उन्हें दूर्वा, लाल चंदन, मोदक, और बूंदी के लड्डुओं का भोग लगाया। यदि हम इस महापर्व की भौगोलिक और सांस्कृतिक छटा पर नजर डालें, तो महाराष्ट्र के मुंबई में ‘लालबागचा राजा’ और पुणे के ‘दगडूसेठ हलवाई गणपति’ के विशाल पंडालों से लेकर उत्तर भारत के उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के सुदूर गांवों तक एक जैसा अद्भुत और आलौकिक माहौल दिखाई दे रहा है, जहाँ बाजारों में रंग-बिरंगी लाइटें, ताजे फूलों के तोरण, पूजा सामग्रियां और फलों की दुकानें सजी हुई हैं, और सुरक्षा के लिहाज से प्रशासन ने भी हर जगह कड़े इंतजाम किए हैं ताकि दर्शनार्थियों को कोई असुविधा न हो। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घने जंगलों में बिना अन्न-जल ग्रहण किए सदियों तक कठिन तपस्या की थी, जिसे हरतालिका तीज के रूप में पूजा जाता है, और चूंकि गणेश जी उन्हीं के लाडले पुत्र हैं, इसलिए ज्योतिषविदों का प्रबल मत है कि आज के दिन शिव परिवार की संयुक्त आराधना करने से मानव जीवन के सभी प्रकार के शारीरिक, मानसिक, और आर्थिक कष्टों का तत्काल निवारण हो जाता है, वैवाहिक जीवन में अटूट प्रेम और विश्वास का संचार होता है, तथा व्यापार व करियर में आने वाले तमाम विघ्न हमेशा के लिए समाप्त हो जाते हैं। त्योहार की इस पवित्र बेला में विद्वान पंडितों ने भक्तों को यह विशेष सलाह भी दी है कि आज रात को भूलकर भी चंद्र दर्शन न करें, क्योंकि चतुर्थी के चंद्रमा को देखने से मिथ्या कलंक लगने का दोष लगता है, और इसके साथ ही तीज का निर्जला व्रत रखने वाली महिलाएं कल यानी 15 सितंबर को सुबह 07:44 बजे चतुर्थी तिथि समाप्त होने से पहले सूर्योदय के बाद ही शुभ समय पर अपना पारण पूर्ण करेंगी। संक्षेप में कहें तो, साल 2026 का यह अनूठा त्योहार न केवल हमारी महान सांस्कृतिक और आध्यात्मिक धरोहर को जीवंत करता है, बल्कि आधुनिक समाज में आपसी भाईचारे, पर्यावरण संरक्षण की चेतना और नई सकारात्मक ऊर्जा का संचार भी कर रहा है, जो हर नागरिक के जीवन को सुख, समृद्धि, शांति और रिद्धि-सिद्धि से सराबोर करने की असीम क्षमता रखता है।

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