मुंगेली / छत्तीसगढ़ के प्रमुख लोक पर्व भोजली को मुंगेली में यादव समाज के तत्वावधान में अत्यंत उत्साह, पारंपरिक उल्लास और धूमधाम के साथ मनाया गया, जहां स्थानीय बड़ा बाजार से एक भव्य शोभायात्रा निकाली गई जो नगर भ्रमण करते हुए आगर नदी तट पर पहुंची और पारंपरिक लोकगीतों के साथ भोजली का विसर्जन किया गया। छत्तीसगढ़ की संस्कृति में यह सिर्फ एक साधारण त्योहार नहीं, बल्कि कृषि समृद्धि और अटूट सौहार्द का जीवंत प्रतीक है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से हरियाली अमावस्या के दिन ‘भोजली खोली’ यानी मिट्टी की छोटी टोकरी में गोबर खाद और मिट्टी मिलाकर अंधेरे में गेहूं या जौ के बीज बोए जाते हैं, जहां सूर्य के प्रकाश के अभाव में क्लोरोफिल न बनने के कारण ये पौधे पीले-सफेद रंग के उगते हैं, जो आगामी रबी सीजन की बंपर पैदावार का पारंपरिक संकेत माने जाते हैं। मुंगेली और आसपास के क्षेत्रों जैसे लोरमी, पथरिया और जरहागांव में रक्षाबंधन से पूर्व लगने वाले भोजली बाजारों से रौनक बढ़ जाती है, जहां लोग उत्साहपूर्वक पूजन सामग्री खरीदते हैं। लगातार आठ दिनों तक घर के देवस्थान या अंधेरी कोठरी में पूरी पवित्रता के साथ महिलाओं द्वारा इसकी सेवा की जाती है, प्रतिदिन सुबह स्नान कर “भोजली भोजली थर-थर कांपे…” जैसे पारंपरिक लोकगीत गाए जाते हैं।

इसके पश्चात रक्षाबंधन के दूसरे दिन शाम को इस अनुष्ठान का मुख्य आकर्षण ‘भोजली बदला’ होता है, जिसमें पूरा ग्रामीण एवं नगरीय समुदाय एकत्र होकर एक-दूसरे के कान के ऊपर भोजली खोंचते हैं और “भोजली लेव-लेव, गंगा जल ले, चिरंजीव रहो” की कामना करते हुए जीवनभर के लिए ‘मितान’ (खास मित्र) बनने का संकल्प लेते हैं। इस अनूठी परंपरा में कृषि परीक्षण, सामाजिक समरसता और दीर्घायु की प्रार्थना का अनूठा संगम देखने को मिलता है, जो जात-पात की सीमाओं को दरकिनार कर आपसी प्रेम को प्रगाढ़ करता है।

विसर्जन के इस पावन अवसर पर समाज के प्रमुख सीरिया यादव ने क्षेत्र और प्रदेशवासियों को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि भोजली हमारी समृद्ध लोक संस्कृति और पारंपरिक पहचान की असली धुरी है, जिसे संजोए रखना तथा भावी पीढ़ी तक पहुंचाना हम सबका नैतिक कर्तव्य है। नगर के आगर नदी तट पर उमड़ी भारी भीड़ और गूंजते पारंपरिक गीतों के बीच यह आयोजन छत्तीसगढ़ी संस्कृति की मिट्टी की सोंधी खुशबू बिखेरते हुए संपन्न हुआ।


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