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मुंगेली। छत्तीसगढ़ के मुंगेली जिले से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जिसने न केवल शासन-प्रशासन के ‘गौ संरक्षण’ के दावों की पोल खोल दी है, बल्कि समाज के उस हिस्से को भी झकझोर दिया है जो बेजुबानों के प्रति संवेदनशीलता रखता है। वर्षों से अपनी मेहनत और जनसहयोग के दम पर घायल मवेशियों का सहारा बनी ‘गौ सेवा धाम’ संस्था के सेवादार आज मजबूर होकर अपने साथ उन घायल गायों, बछड़ों और भैंसों को लेकर जिला कलेक्टोरेट परिसर पहुंच गए, जिनकी सेवा वे अब तक टूटे-फूटे शेड में कर रहे थे। कलेक्टोरेट के मुख्य द्वार पर लगे ‘गौ सेवा धाम, कलेक्टर मुंगेली’ के बैनर ने आज सत्ता के गलियारों में खलबली मचा दी है। यह केवल एक विरोध प्रदर्शन नहीं, बल्कि व्यवस्था के खिलाफ एक ऐसी कराह है जो बीती रात आए तूफान के बाद और भी तीखी हो गई है।
शून्य से सृजन: गौ सेवा धाम का संघर्ष
मुंगेली की यह संस्था किसी सरकारी अनुदान या बड़े कॉर्पोरेट फंड के भरोसे नहीं चल रही थी। सड़क दुर्घटनाओं में लहूलुहान होकर दम तोड़ते मवेशियों को नया जीवन देने के संकल्प के साथ कुछ युवाओं और सेवादारों ने इस सफर की शुरुआत की थी। सड़क किनारे पड़े बेसहारा और बीमार जानवरों को उठाकर लाना, उनका उपचार करना और उन्हें चारा उपलब्ध कराना इन लोगों की दिनचर्या थी। संसाधनों के नाम पर इनके पास केवल अटूट विश्वास और जनसहयोग से जुटाया गया थोड़ा-बहुत धन था। प्रशासन से बार-बार जमीन और एक पक्के गोठान की मांग करने के बावजूद जब इन्हें निराशा हाथ लगी, तो इन्होंने अपनी सीमित क्षमता से बांस के खंभों और त्रिपाल के सहारे एक अस्थायी शेड तैयार किया। यह शेड उन दर्जनों गायों और पशुओं का घर बना, जिनके पास न सिर छिपाने की जगह थी और न ही सहारा।
कुदरत का कहर और प्रशासनिक बेरुखी
बीती रात मुंगेली में आई तेज आंधी और मूसलाधार बारिश ने इस संस्था की सालों की मेहनत पर पानी फेर दिया। तेज हवाओं ने त्रिपाल को फाड़ दिया और बांस के ढांचे को तिनके की तरह बिखेर दिया। इस आपदा के बाद स्थिति यह हो गई कि जो मवेशी पहले से ही दुर्घटनाओं के कारण चलने-फिरने में लाचार थे, वे भीषण बारिश में भीगने और ठंड से कांपने को मजबूर हो गए। सेवादारों ने पूरी रात उन बेजुबानों को बचाने की कोशिश की, लेकिन जब सुबह हुई और चारों तरफ तबाही का मंजर दिखा, तो उनका सब्र टूट गया। महीनों से अधिकारियों के चक्कर काट रहे इन युवाओं ने महसूस किया कि शांतिपूर्ण तरीके से गुहार लगाने का वक्त अब निकल चुका है।
कलेक्टोरेट परिसर बना ‘गौ सेवा धाम’
आज सुबह जब मुंगेली के लोग अपने काम पर निकले, तो कलेक्टोरेट का नजारा बदला हुआ था। ट्रक और ट्रॉलियों में भरकर घायल गौवंश को सीधे कलेक्टर कार्यालय के सामने लाया गया। जो गायें चल नहीं पा रही थीं, उन्हें स्ट्रेचर और क्रेन के सहारे गेट के पास उतारा गया। प्रदर्शनकारियों ने कलेक्टोरेट के मुख्य गेट पर ही अपनी संस्था का बैनर टांग दिया और उस पर लिख दिया— ‘गौ सेवा धाम, कलेक्टर मुंगेली’। यह एक प्रतीकात्मक संदेश था कि यदि प्रशासन इन पशुओं को रहने की जगह नहीं दे सकता, तो अब से कलेक्टर कार्यालय ही इन बेजुबानों का घर होगा।
कलेक्टोरेट के गेट पर ही सेवादारों ने चटाई बिछाई और सामूहिक रूप से हनुमान चालीसा का पाठ शुरू कर दिया। उनके चेहरों पर गुस्सा भी था और आंखों में उन जानवरों के प्रति दर्द भी, जिन्हें वे अपने बच्चों की तरह पालते आए हैं। परिसर के भीतर और बाहर गायों के लेटने और चारे के बिखरे होने से प्रशासनिक कामकाज पूरी तरह ठप नजर आया। कलेक्टोरेट पहुंचने वाले कर्मचारी और आम नागरिक भी इस दृश्य को देख स्तब्ध रह गए।
प्रशासन के दावों पर सवालिया निशान
करोड़ों रुपये गोठानों के निर्माण पर खर्च हो रहे हैं, तो फिर एक सक्रिय सेवा भावी संस्था को बांस और त्रिपाल का सहारा क्यों लेना पड़ा? क्यों बार-बार आवेदन देने के बाद भी एक घायल पशु चिकित्सा केंद्र या आश्रय स्थल के लिए भूमि आवंटन नहीं किया गया? प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि जनप्रतिनिधि केवल वोट की राजनीति के समय गौ माता का नाम लेते हैं, लेकिन जब वास्तव में उनकी सेवा और संरक्षण की बात आती है, तो फाइलें दफ्तरों की धूल फांकने लगती हैं।
मांगें और आंदोलन की चेतावनी
धरने पर बैठे संस्था के सदस्यों ने स्पष्ट कर दिया है कि वे अब खाली हाथ लौटने वाले नहीं हैं। उनकी मुख्य मांगें निम्नलिखित हैं:
लाचार और सड़क हादसों में घायल पशुओं के लिए तत्काल एक स्थायी पक्के शेड और परिसर की व्यवस्था की जाए।
पशुओं के चारे, पानी और नियमित चिकित्सा के लिए प्रशासन बजट आवंटित करे।
गौ सेवा धाम को सरकारी जमीन का आवंटन किया जाए ताकि भविष्य में ऐसी प्राकृतिक आपदा से पशुओं को बचाया जा सके।
मौके पर तैनात पुलिस बल और प्रशासनिक अधिकारियों ने प्रदर्शनकारियों को शांत करने और गायों को वहां से हटाने का प्रयास किया, लेकिन गौ सेवक अपनी मांगों पर अड़े रहे। उनका कहना है कि जब तक कलेक्टर स्वयं आकर इन बेजुबानों की जिम्मेदारी नहीं लेते, तब तक यह धरना अनवरत जारी रहेगा।
संवेदनशीलता की कसौटी पर तंत्र
मुंगेली कलेक्टोरेट में आज मवेशियों की जो कराह सुनाई दे रही है, वह केवल एक संस्था की मांग नहीं है, बल्कि उस मूक आबादी की आवाज है जो बोल नहीं सकती। यह घटना प्रशासन के लिए एक आईना है कि कागजी योजनाओं और जमीनी हकीकत में कितना बड़ा फासला है। एक तरफ जहां सरकारें गौ संरक्षण के नाम पर बड़ी-बड़ी बातें करती हैं, वहीं दूसरी तरफ जमीन पर काम करने वाले वास्तविक गौ सेवक तिरस्कृत महसूस कर रहे हैं। अब देखना यह होगा कि मुंगेली जिला प्रशासन इस संकट का समाधान कैसे निकालता है— क्या वह इन बेजुबानों को उनका हक देगा या फिर पुलिसिया बल के सहारे इस आंदोलन को दबाने की कोशिश की जाएगी। फिलहाल, मुंगेली कलेक्टोरेट ‘गौ सेवा धाम’ बना हुआ है और न्याय की प्रतीक्षा कर रहा है।

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