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चेन्नई /तमिलनाडु की सियासत हमेशा से फिल्म सितारों और द्रविड़ विचारधारा के इर्द-गिर्द घूमती रही है। लेकिन वर्तमान समय में राज्य की राजनीति एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां दशकों पुराने ‘द्रविड़ बनाम द्रविड़’ (DMK बनाम AIADMK) के मुकाबले को एक नई चुनौती मिल रही है। यह चुनौती किसी मंझे हुए राजनेता से नहीं, बल्कि तमिल सिनेमा के सबसे बड़े सुपरस्टार्स में से एक ‘थलपति’ विजय से मिल रही है।
हाल ही में सोशल मीडिया पर वायरल हो रही रिपोर्टों और राजनीतिक गलियारों में चल रही चर्चाओं ने एक नया विमर्श छेड़ दिया है: “तमिलनाडु में नास्तिक मुख्यमंत्री के बाद क्या अब ईसाई मुख्यमंत्री की बारी है?”
1. द्रविड़ किले में विजय की ‘एंट्री’
तमिलनाडु की राजनीति पिछले 50 वर्षों से करुणानिधि और जयललिता जैसे कद्दावर नेताओं के साये में रही है। एम.के. स्टालिन (DMK) वर्तमान में मुख्यमंत्री हैं और खुद को एक घोषित नास्तिक और द्रविड़ मूल्यों का रक्षक बताते हैं। वहीं, जयललिता के बाद AIADMK बिखराव के दौर से गुजर रही है। इसी शून्य को भरने के लिए विजय ने अपनी पार्टी तमिझगा वेत्री कड़गम (TVK) का बिगुल फूँका है।
विजय की राजनीति केवल ग्लैमर तक सीमित नहीं है। उन्होंने अपनी पहली ही रैली में स्पष्ट कर दिया कि वह ‘सेक्युलर सोशल जस्टिस’ और ‘तमिल राष्ट्रवाद’ के मिश्रण के साथ मैदान में उतर रहे हैं। जानकारों का मानना है कि विजय ने स्टालिन की DMK और जयललिता की विरासत वाली AIADMK को किनारे लगाने की पूरी तैयारी कर ली है।
2. ‘जोसेफ विजय’ और धार्मिक पहचान का मुद्दा
विजय का पूरा नाम जोसेफ विजय चंद्रशेखर है। वह एक ईसाई परिवार से आते हैं। हालांकि तमिलनाडु की राजनीति में धर्म कभी भी उत्तर भारत की तरह हावी नहीं रहा, लेकिन विजय की धार्मिक पहचान को लेकर अक्सर विरोधी खेमा सवाल उठाता रहा है।
छवि में दिखाई गई हेडलाइन इस बात की ओर इशारा करती है कि यदि विजय सत्ता में आते हैं, तो वह राज्य के इतिहास में एक महत्वपूर्ण बदलाव ला सकते हैं। तमिलनाडु ने अब तक हिंदू और नास्तिक मुख्यमंत्री देखे हैं, ऐसे में एक ईसाई मुख्यमंत्री की संभावना राज्य के सामाजिक-राजनैतिक ताने-बाने के लिए एक नया अनुभव होगी। हालांकि, विजय खुद को हमेशा एक ‘तमिल’ पहचान के साथ जोड़ते हैं और धार्मिक ध्रुवीकरण से बचते रहे हैं।
3. सिनेमाई नायक से जननायक तक का सफर
विजय का राजनीतिक सफर अचानक नहीं शुरू हुआ। इसके पीछे दो दशकों की सोची-समझी रणनीति है:
बचपन और करियर: विजय ने एक बाल कलाकार के रूप में शुरुआत की और धीरे-धीरे ‘मास हीरो’ की छवि बनाई।
फैन बेस का नेटवर्क: उनके ‘विजय मक्कल इयक्कम’ (VMI) ने सालों तक जमीन पर समाज सेवा की, जिसे अब एक राजनीतिक पार्टी में बदल दिया गया है।
युवा शक्ति: विजय की सबसे बड़ी ताकत राज्य का युवा वर्ग है, जो DMK और AIADMK के वंशवाद और भ्रष्टाचार के आरोपों से ऊब चुका है।
4. DMK और AIADMK के लिए खतरे की घंटी
विजय की पार्टी TVK ने जिस तरह से अपनी नीतियों को पेश किया है, वह सीधे तौर पर सत्ताधारी DMK के ‘द्रविड़ मॉडल’ को चुनौती देती है। विजय का तर्क है कि राज्य में बदलाव की जरूरत है और द्रविड़ राजनीति के नाम पर जो चल रहा है, वह अब अप्रासंगिक हो चुका है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि विजय की उपस्थिति से सबसे ज्यादा नुकसान AIADMK को हो सकता है, क्योंकि उनका वोट बैंक (युवा और दलित समुदाय) अब विजय की ओर झुक रहा है। वहीं, DMK के लिए भी ‘एंटी-इन्कंबेंसी’ (सत्ता विरोधी लहर) को रोकना मुश्किल होगा, खासकर तब जब सामने एक ऐसा चेहरा हो जिसकी फैन फॉलोइंग लाखों में है।
5. क्या तमिलनाडु तैयार है इस बदलाव के लिए?
इतिहास गवाह है कि तमिलनाडु ने एमजीआर (MGR) और जयललिता जैसे फिल्मी सितारों को सिर आंखों पर बैठाया है। लेकिन रजनीकांत और कमल हासन जैसे दिग्गजों की राजनीति में असफलता यह भी बताती है कि केवल स्टार पावर काफी नहीं है।
विजय ने अपनी रैलियों में जिस ‘जुझारू’ तेवर का परिचय दिया है, उसने यह साबित कर दिया है कि वह केवल ‘पार्ट टाइम’ नेता नहीं हैं। उन्होंने अपनी फिल्मों से संन्यास लेने की घोषणा कर दी है, जो यह दर्शाता है कि वह राजनीति को लेकर गंभीर हैं।
6. चुनौतियां और भविष्य की राह
विजय के सामने सबसे बड़ी चुनौती राज्य के जटिल जातीय समीकरणों को साधना है। तमिलनाडु में जाति आधारित राजनीति की जड़ें बहुत गहरी हैं। इसके अलावा, बीजेपी का राज्य में बढ़ता प्रभाव भी उनके लिए एक चुनौती बन सकता है।
क्या वह वाकई स्टालिन के अभेद्य दुर्ग को ढहा पाएंगे? क्या वह तमिलनाडु के पहले ईसाई मुख्यमंत्री बनकर इतिहास रचेंगे? इन सवालों के जवाब आने वाले विधानसभा चुनावों में मिलेंगे। लेकिन एक बात तय है—थलपति विजय ने द्रविड़ राजनीति की बिसात पर ऐसा मोहरा चला है, जिसने बड़े-बड़े दिग्गजों की नींद उड़ा दी है।
विजय की कहानी एक ऐसे नायक की है जिसने परदे पर तो कई जंग जीती हैं, लेकिन अब वह लोकतंत्र के असली मैदान में है। उनकी यात्रा यह तय करेगी कि क्या तमिलनाडु अपनी पुरानी लीक पर चलेगा या फिर एक नए ‘थलापति’ के नेतृत्व में नई राह पकड़ेगा।


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