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छत्तीसगढ़ / छत्तीसगढ़ के औद्योगिक गलियारों में इन दिनों एक ऐसी ‘स्क्रिप्ट’ की चर्चा है, जिसने राज्य के आबकारी और औद्योगिक हलकों में खलबली मचा दी है।कहते हैं कि राजनीति और व्यापार में कुछ भी इत्तेफाक नहीं होता। हर घटना के पीछे एक स्क्रिप्ट होती है और हर शोर के पीछे एक सन्नाटा होता है। छत्तीसगढ़ के उद्योग में इन दिनों जो ‘शोर’ सुनाई दे रहा है, वह किसी बड़े धमाके की पूर्व आहट हो सकता है। शिवनाथ नदी में मछलियों की मौत से लेकर पानी के रंग बदलने तक की खबरों के बीच अब एक ऐसा ‘व्यावसायिक षड्यंत्र’ उभर कर सामने आ रहा है, जिसने छत्तीसगढ़ के पुराने उद्योगपतियों और मुंगेली के ग्रामीणों की नींद उड़ा दी है।
सवाल सीधा है क्या छत्तीसगढ़ की तीन स्थापित डिस्टलरीज—केडिया, भाटिया और वेलकम—को रास्ते से हटाने के लिए किसी दिगर प्रांत (बाहरी राज्य) के बड़े औद्योगिक घराने ने ‘सुपारी’ दी है? क्या यह ‘सुपारी’ कानूनी अड़चनों, नकारात्मक खबरों और प्रशासनिक दबाव के जरिए पूरी की जा रही है?
1. ‘बड़ी मछली’ का खेल 200 बनाम 600 KLD का गणित
इस पूरे विवाद की जड़ में वह विशालकाय डिस्टलरी प्लांट है, जो मुंगेली जिले के फास्टरपुर इलाके के सिल्ली (कैथ नवागांव) में प्रस्तावित है। इसे लगाने वाली कंपनी है—आर.एस.एल.डी. बायोफ्यूल्स प्रा. लि.। आंकड़ों के खेल को समझें तो पूरी तस्वीर साफ हो जाती है। छत्तीसगढ़ में वर्तमान में संचालित तीन प्रमुख डिस्टलरीज की कुल क्षमता इस प्रकार है-
भाटिया डिस्टलरी (धूमा): 60 KLD
वेलकम डिस्टलरी (कोटा): 40 KLD
केडिया डिस्टलरी (कुम्हारी): 100 KLD
कुल क्षमता: 200 KLD (किलो लीटर प्रतिदिन)
अब गौर कीजिए प्रस्तावित नए प्लांट पर। इसकी अकेले की क्षमता 600 KLD है। यानी यह नया प्लांट छत्तीसगढ़ की तीन मौजूदा डिस्टलरीज के कुल उत्पादन से 3 गुना ज्यादा बड़ा होगा। औद्योगिक विशेषज्ञों का कहना है कि जब कोई इतना बड़ा प्लेयर बाजार में उतरता है, तो वह ‘मोनोपोली’ (एकाधिकार) चाहता है। अगर पुराने तीन प्लांट चलते रहे, तो नए प्लांट को कच्चा माल (जैसे टूटा चावल/मक्का) जुटाने और बाजार में अपनी पकड़ बनाने में कड़ी चुनौती मिलेगी। यही कारण है कि ‘व्यावसायिक प्रतिद्वंदिता’ की आशंका को बल मिल रहा है।
2. शिवनाथ नदी का ‘ट्रेलर’ और सुनियोजित प्रोपेगेंडा
पिछले कुछ दिनों से बिलासपुर और पथरिया क्षेत्र में शिवनाथ नदी को लेकर जो खबरें उड़ाई गईं, लेख के अनुसार वह इसी बड़ी साजिश का ‘ट्रेलर’ हो सकती हैं। खबर फैलाई गई कि नदी का पानी काला हो गया है और लाखों मछलियां मर गई हैं। इसका सीधा दोष पास की डिस्टलरी पर मढ़ने की कोशिश हुई। लेकिन जब प्रशासनिक तथ्यों को खंगाला, तो सच्चाई कुछ और निकली। पथरिया तहसीलदार अतुल वैष्णव ने ऑन-रिकॉर्ड कहा कि नदी का पानी काला नहीं हुआ है और बड़ी संख्या में मछलियां मरने की बात भी निराधार है। केवल किनारे पर कुछ छोटी मछलियां मृत मिली थीं, जिसके सैंपल जांच के लिए भेजे गए हैं। चर्चा है कि बाहरी राज्य के उद्योगपति ने स्थानीय तंत्र का उपयोग कर इन खबरों को हवा दी ताकि पुराने प्लांटों पर ‘प्रदूषण’ का ठप्पा लगाकर उन्हें हमेशा के लिए सील करवाया जा सके।
3. पंजाब कनेक्शन और रसूख की जंग
इस पूरे मामले के तार दो साल पहले से जुड़े हैं। बताया जा रहा है कि पंजाब के एक प्रभावशाली राजनेता ने छत्तीसगढ़ के मुंगेली जिले में इस विशालकाय डिस्टलरी की नींव रखी थी। दिलचस्प बात यह है कि जैसे ही इस नए प्लांट की प्रक्रिया शुरू हुई, वैसे ही पुराने तीनों प्लांटों के खिलाफ पर्यावरण नियमों के उल्लंघन की शिकायतें, ग्रामीणों का तथाकथित विरोध और मुकदमों का सिलसिला तेज हो गया। वर्तमान में यह मामला उच्च न्यायालय में भी लंबित है। क्या यह महज संयोग है कि दो साल से ही पुराने प्लांटों पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं?
4. मुंगेली का ‘वाटर बम’: 20 गांवों का भविष्य दांव पर
जहाँ एक तरफ उद्योगपतियों की आपस में ‘सुपारी’ जंग चल रही है, वहीं मुंगेली जिले का फास्टरपुर इलाका एक बड़े मानवीय और पर्यावरणीय संकट की ओर बढ़ रहा है। सिल्ली में प्रस्तावित इस मल्टी-इंटीग्रेटेड प्लांट में:
600 KLD रेक्टिफाइड स्पिरिट/इथेनॉल प्लांट।
12 मेगावाट का बिजली संयंत्र।
इन संयंत्रों को ठंडा करने और उत्पादन के लिए करोड़ों घनलीटर पानी की जरूरत होगी। फास्टरपुर इलाके में न तो कोई बड़ी नदी है, न ही कोई बड़ा बांध। कंपनी की योजना जमीन के हजारों फीट नीचे से ‘आधुनिक तकनीक’ के जरिए पानी खींचने की है।
खतरनाक परिणाम: फरवरी से जून के बीच इस क्षेत्र के बोरवेल पहले ही दम तोड़ देते हैं। ग्रामीणों को पेयजल के लिए मीलों चलना पड़ता है। अगर यह प्लांट शुरू हुआ, तो आसपास के 20 किलोमीटर के दायरे में वाटर लेवल इतना नीचे चला जाएगा कि किसानों के खेत बंजर हो जाएंगे और निस्तारी के लिए एक बूंद पानी नहीं बचेगा। फास्टरपुर, जो कभी हरियाली के लिए जाना जाता था, एक ‘रेगिस्तान’ में तब्दील हो सकता है।
5. जनसुनवाई का ‘दिखावा’ और विपक्ष का कड़ा रुख
इस प्लांट की पर्यावरणीय जनसुनवाई 17 नवंबर 2025 को हुई थी। आरोप है कि यह जनसुनवाई महज एक औपचारिकता थी और इसमें ग्रामीणों की वास्तविक चिंताओं को नजरअंदाज किया गया।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अर्जुन तिवारी ने इस मुद्दे पर मुंगेली के स्थानीय जनप्रतिनिधियों की चुप्पी को ‘रहस्यमयी’ बताया है। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा, “हम इस प्लांट को फास्टरपुर की छाती पर नहीं लगने देंगे। जहाँ पानी की प्रचुरता हो, वहाँ प्लांट लगाएं, लेकिन हमारे उपजाऊ इलाके को बंजर बनाने की अनुमति नहीं दी जाएगी। हम एनजीटी (NGT) और सुप्रीम कोर्ट तक जाएंगे।” अर्जुन तिवारी ने स्पष्ट किया कि 2025 की जनसुनवाई में कई कानूनी त्रुटियां थीं, जिनके आधार पर इसे निरस्त कराया जाएगा।
6. छत्तीसगढ़ का उद्योग बनाम बाहरी दबदबा
यह लड़ाई अब ‘छत्तीसगढ़ी बनाम बाहरी रसूख’ की ओर मुड़ती दिख रही है। क्या छत्तीसगढ़ की सरकार और प्रशासन बाहरी उद्योगपतियों के दबाव में आकर अपने ही राज्य के पुराने उद्योगों को ‘कुर्बान’ कर देंगे? क्या मुंगेली के किसानों का हक मारकर एक शराब फैक्ट्री को पानी दिया जाएगा?
छत्तीसगढ़ के औद्योगिक इतिहास में यह एक महत्वपूर्ण मोड़ है। एक तरफ व्यापारिक प्रतिद्वंदिता की ‘सुपारी’ है, तो दूसरी तरफ एक पूरे इलाके के अस्तित्व का संकट। मुंगेली जिले के 20 गांव और छत्तीसगढ़ की तीन डिस्टलरीज आज एक ही कतार में खड़े हैं—विनाश की कगार पर। अब देखना होगा कि प्रशासन इस ‘बड़ी मछली’ के खेल को रोकता है या फिर छोटे उद्योगों और किसानों को निगलने की छूट देता है।
आम जनता के बीच चर्चा का विषय बने डिस्टलरी प्लांट को आसान शब्दों में समझें तो यह एक ऐसा आधुनिक कारखाना है, जहाँ अनाज या गन्ने के शीरे को ‘आसवन’ (Distillation) की प्रक्रिया से गुजारकर उच्च गुणवत्ता वाला ‘स्पिरिट’ यानी शुद्ध अल्कोहल तैयार किया जाता है। इस स्पिरिट का उपयोग न केवल शराब बनाने में, बल्कि औषधियों, सैनिटाइजर और पेट्रोल में मिलाए जाने वाले ‘इथेनॉल’ के रूप में भी होता है। किसी भी प्लांट की ताकत को ‘KLD’ (Kilo Liters per Day) में मापा जाता है, जहाँ 1 KLD का अर्थ 1,000 लीटर प्रतिदिन का उत्पादन है। उदाहरण के तौर पर, 600 KLD क्षमता वाले विशालकाय प्लांट का अर्थ है प्रतिदिन 6 लाख लीटर स्पिरिट का उत्पादन, जिसके संचालन के लिए भारी मात्रा में जल की आवश्यकता होती है। यही कारण है कि बड़े क्षमता वाले प्लांटों के लगने से औद्योगिक विकास तो होता है, लेकिन स्थानीय जल स्तर और पर्यावरणीय संतुलन को लेकर चिंताएं भी गहराने लगती हैं।

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